दिल्ली हाईकोर्ट की झाड़: 'दिव्यांगों के साथ ये कैसी बेरुख़ी!'
Anam Ibrahim
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*दिल्ली/भारत:*
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो सरकारी लापरवाही पर तीखे तंज कसता है। ये फैसला उन तमाम दिव्यांगों के दिल में एक अजीब सी कसक और उम्मीद दोनों को जगा देता है, जिन्हें हर बार काग़ज़ी खेलों में उलझा दिया जाता है।
*BBC OF INDIA. COM*
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जस्टिस नवीन चावला और शालिंदर कौर की पीठ ने इस मामले में सरकार को ऐसा कटघरा दिखाया, जिसमें जवाबदेही की एक भी ईंट नज़र नहीं आती। मामला भारतीय तटरक्षक बल के पूर्व कर्मचारी का था, जिसे सेवा के दौरान दो गंभीर विकलांगताएं हुईं।
अब आप सुनिए हुकूमत की करतूत। मेडिकल बोर्ड ने दिव्यांगता पेंशन की सिफारिश की थी, लेकिन साहब लोग बैठ गए "न" पर। अरे भाई, वो तो चला आया अदालत, वरना आपकी ये बेमुरव्वती तो पेंशन के साथ-साथ उसका दिल भी दफन कर देती।
*सरकार का तर्क: "हमें कुछ नहीं पता!"*
सरकार ने बड़े मासूम लहजे में कहा, "ये विकलांगता सेवा के कारण नहीं हुई।" हाईकोर्ट ने तंजिया अंदाज़ में पूछा, "अच्छा? जब भर्ती हुआ तो बिल्कुल फिट था। फिर ये विकलांगता सेवा के दौरान ही क्यों निकली?" साहिबान, सरकार कोई जवाब न दे पाई।
*हाईकोर्ट का वार:*
न्यायालय ने साफ कहा, "मेडिकल बोर्ड की राय पर विचार किए बिना, अमान्य पेंशन पकड़ा देना सरकार की ज़बरदस्त लापरवाही है। दिव्यांगता पेंशन का हक उससे छीना नहीं जा सकता।"
हाईकोर्ट ने 50% विकलांगता के साथ 8% वार्षिक ब्याज सहित पेंशन देने का हुक्म सुनाया। लेकिन ये आदेश सिर्फ उस याचिकाकर्ता के लिए नहीं, बल्कि हर उस दिव्यांग को एक सबक है, जिसे उसकी हक़ की लड़ाई में अकेला छोड़ दिया गया है।
*दिव्यांगों की व्यथा:*
दिल में सवाल है कि क्या ये अदालती फैसले हर दिव्यांग के आंसू पोंछ सकते हैं? एक अपाहिज पत्रकार की कलम से सवाल उठता है, "हुकूमत कब सुधरेगी?" काग़ज़ों पर नियम-कानून, ज़मीनी हकीकत में बेरुखी। ये कैसा मज़ाक है उन लोगों के साथ, जो पहले ही ज़िंदगी से लड़ रहे हैं?
ऐसे में सरकार की गैरज़िम्मेदारी देखकर दिल यही कहता है, "दिल टूट भी जाए, पर हक मत छोड़िए!"
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