भोपाल की गलियों में भटकता बचपन और डायल 112 सायरन की गोद में लौटी एक माँ की साँस!
भोपाल की गलियों में भटकता बचपन और डायल 112 सायरन की गोद में लौटी एक माँ की साँस!
Anam Ibrahim
Journalist
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शहर की भीड़ में खोया हुआ बच्चा!! और एक माँ, जो उस शाम धीरे-धीरे मर रही थी!!!
भोपाल की सड़कें उस रोज़ भी आबाद थीं। दुकानों पर रोशनी थी, गाड़ियों में शोर था, लोग हँस रहे थे सिर्फ़ एक औरत थी जिसकी दुनिया पाँच साल के क़द जितनी होकर अचानक गुम हो गई थी।
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थाना अयोध्या नगर की उस शाम में सूरज धीरे-धीरे उतर रहा था। सड़कें रोज़ की तरह आबाद थीं, दुकानों पर रौनक थी, लोग अपनी-अपनी दुनियाओं में गुम थे। मगर उन्हीं गलियों के बीच एक पाँच साल का बच्चा ऐसा खोया, जैसे भीड़ ने उसकी नन्ही उँगली थाम ली हो।
दरअसल इसरो N सेक्टर के दुर्गा मंदिर के पास खड़ा वह मासूम शायद अभी खो जाना शब्द का मतलब भी नहीं जानता था। उसकी आँखों में डर था, होंठों पर सूखी हुई खामोशी थी और चेहरा ऐसा, जैसे किसी ने बचपन को अचानक वीराने में छोड़ दिया हो।
शाम 05:46 बजे डायल-112 भोपाल में सूचना पहुँची। सरकारी काग़ज़ों में यह महज़ एक कॉल थी, मगर असल में वह एक माँ की फटती हुई रूह की आवाज़ थी। वह चीख़, जो फोन की घंटियों में दब गई थी…
“मेरा बच्चा कहीं खो गया है”
लिहाज़ा इत्तेला हासिल होते ही थाना अयोध्या नगर की एफआरव्ही तुरंत मौक़े पर रवाना हुई। सउनि मोहम्मद सादिक और पायलट वैभव दुबे मौके पर पहुँचे। उन्होंने बच्चे को अपने संरक्षण में लिया। उस वक़्त पुलिस की वर्दी सिर्फ़ कानून नहीं थी वह उस मासूम के लिए चलती फिरती फरिश्तो की टोली की तरह थी।
बच्चा शायद समझ नहीं पा रहा था कि यह शहर इतना बड़ा क्यों है!! और माँ इतनी दूर कैसे हो गई।!!!
वह बार-बार भीड़ को देखता होगा हर चेहरे में शायद अपनी माँ की शक्ल ढूँढ़ता होगा।
क्योंकि बच्चों के लिए दुनिया का सबसे बड़ा नक्शा सिर्फ़ उसकी “माँ” का चेहरा ही तो होता है।
उधर उसकी माँ गलियों में पागलों की तरह भटक रही थी।
हर मोड़ पर दिल धड़कता होगा!!
हर छोटे बच्चे को देखकर साँस अटकती होगी!!
हर सेकंड किसी सदियों की सज़ा की तरह सीने पर गिर रहा होगा।
फिर अचानक तलाश खत्म हुई।
माँ सामने थी।
बच्चा सामने था।
उस पल कोई कैमरा उस औरत की आँखों में भरा समंदर रिकॉर्ड नहीं कर सकता था। वह अपने बच्चे को सीने से ऐसे चिपका रही थी, जैसे दुनिया की तमाम आफ़तों से उसे वापस छीन लाई हो। वहाँ सिर्फ़ एक माँ नहीं रो रही थी वहाँ ख़ुद इंसानियत की पलकों पर नमी उतर आई थी।
पहचान और सत्यापन के बाद बच्चे को माँ के सुपुर्द किया गया। परिजनों ने डायल-112 जवानों का शुक्रिया अदा किया। मगर असली सवाल अब भी बरकरार है
क्या हमारे शहर इतने बेरहम हो चुके हैं कि बचपन अब गलियों में भी महफूज़ नहीं?
क्या हम इतने मशीन बन गए हैं कि किसी रोते हुए बच्चे की आँखों में अपना घर दिखाई देना बंद हो गया?
यह महज़ “मिसिंग एंड फाउंड” की पुलिस कहानी नहीं है
यह उस समाज का आईना है, जहाँ बचपन अब खिलौनों से नहीं, ख़ौफ़ से खेल रहा है।
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