भोपाल के थाना चूनाभट्टी में गिरफ़्तार हुआ दशरथ, मगर फ़रार अब भी कई सवाल हैं!!

भोपाल के थाना चूनाभट्टी में गिरफ़्तार हुआ दशरथ, मगर फ़रार अब भी कई सवाल हैं!!

भोपाल के थाना चूनाभट्टी में गिरफ़्तार हुआ दशरथ, मगर फ़रार अब भी कई सवाल हैं!!

Anam Ibrahim 

Journalist

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हत्या, हथियार और गुंडागर्दी के एक दर्जन मुक़दमों वाला शख़्स 500 रुपये की अड़ीबाज़ी पर पकड़ा गया!

कभी-कभी किसी वारदात की असल कहानी एफआईआर में नहीं, बल्कि उन सवालों में छुपी होती है जो एफआईआर दर्ज होने के बाद पैदा होते हैं। चूनाभट्टी थाने की ताज़ा कार्रवाई भी कुछ ऐसी ही दास्तान कह रही है।

            BBC_OF_INDIA

            जनसम्पर्क Life 

Bhopal/Mp: भोपाल के थाना चूनाभट्टी पुलिस ने एक बदमाश पकड़ लिया है। प्रेसनोट यही कहती है।

लेकिन प्रेसनोटें अक्सर वही बताती हैं जो पुलिस ने किया। यह कम ही बताती हैं कि पुलिस क्या नहीं कर सकी।

 वैसे इस मामले मे दिलचस्प यह भी है कि प्रेसनोट में 500 रुपये की कथित अड़ीबाज़ी की शिकायत से शुरू हुआ मामला पढ़ते-पढ़ते अचानक अपराध-जगत की किसी सनसनीखेज़ फ़िल्म का ट्रेलर लगने लगता है। आरोप अभी अदालत की चौखट तक पहुँचे भी नहीं, मगर विशेषणों की हथकड़ियाँ पहले ही पहनाई जा चुकी हैं। शातिर,बड़ा बदमाश, व एक दर्जन अपराध सब कुछ मौजूद है। बस फैसला सुनाने वाली अदालत का ज़िक्र कहीं पीछे छूट जाता है।

बहरहाल 

बाबा नगर की गलियों से गिरफ़्तार हुआ 28 वर्षीय दशरथ गजभिये कोई ऐसा नाम नहीं निकला जिसे मोहल्ले वाले पहली बार सुन रहे हों। खुद पुलिस का अपना रिकॉर्ड कहता है कि उसके खिलाफ हत्या, अवैध हथियार, मारपीट और अड़ीबाज़ी समेत एक दर्जन से ज़्यादा मुक़दमे दर्ज हैं। यानी यह आदमी अपराध की दुनिया में नया भर्ती हुआ सिपाही नहीं, बल्कि पुराना खिलाड़ी था।

भोपाल की सड़कों पर उसका आना-जाना जारी रहा।

वह लोगों से टकराता रहा।

लोग उससे बचते रहे।

और फ़ाइलें उससे भी ज़्यादा बचती रहीं।

ताज़ा मामला खुशीलाल अस्पताल की कैंटीन तक पहुँचा, जहाँ सुरेन्द्र सहारे से कथित तौर पर शराब के लिए 500 रुपये मांगे गए। रुपये नहीं मिले तो गालियाँ निकलीं, डंडा निकला और जान से मारने की धमकियाँ भी बाहर आ गईं। इसके बाद पुलिस हरकत में आई और चंद घंटों में आरोपी को धर दबोचने का दावा कर दिया गया।

दावा शानदार है।

लेकिन सवाल उससे भी ज़्यादा शानदार है।

*जिस आदमी का आपराधिक हिसाब-किताब पुलिस की अपनी अलमारी में एक दर्जन मुक़दमों से भरा पड़ा था, वह आखिर किस भरोसे पर मोहल्लों में घूम रहा था?*

क्या उसे अपने बाहुबल पर भरोसा था?

या उसे मालूम था कि कानून की चाल उससे भी धीमी है?

प्रेसनोट में थाना प्रभारी कमलेन्द्र चौबे और उनकी टीम की तत्परता का विस्तार से ज़िक्र है। होना भी चाहिए। गिरफ़्तारी पुलिस का काम है और काम होने पर उसका उल्लेख भी होना चाहिए।

मगर शहर के लोग शायद यह भी जानना चाहते हैं कि अगर अपराधी इतना पुराना था, तो उसकी गिरफ़्तारी की कहानी हर बार किसी नई शिकायत से ही क्यों शुरू होती है?

क्या कानून की आँखें सिर्फ़ नई वारदात के बाद खुलती हैं?

क्या एक दर्जन मुक़दमे भी किसी आदमी को पुलिस की स्थायी निगरानी में रखने के लिए काफी नहीं होते? 

बहरहाल, दशरथ गजभिये अब सलाखों के पीछे है।

मगर चूनाभट्टी की इस गिरफ़्तारी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि इस मुल्क में कई बार अपराधी बाद में पकड़ा जाता है, उसका इतिहास पहले से खुला घूमता रहता है।

और इतिहास जब सड़कों पर घूमने लगे, तो डर सिर्फ़ बदमाश से नहीं, उस ख़ामोशी से भी लगना चाहिए जो उसे पहचानती तो है, मगर रोक नहीं पाती।