एक नाम, दो वोटर आईडी और कई सवाल: SIR पर कांग्रेस का हमला, चुनाव आयोग से मांगा हिसाब!

एक नाम, दो वोटर आईडी और कई सवाल: SIR पर कांग्रेस का हमला, चुनाव आयोग से मांगा हिसाब!

एक नाम, दो वोटर आईडी और कई सवाल: SIR पर कांग्रेस का हमला, चुनाव आयोग से मांगा हिसाब!

Anam Ibrahim 

Journalist_007

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मप्र वोट का जिन्न बोतल से बाहर! एक नाम पर दो-दो वोटर आईडी, अब चुनाव आयोग बताए असली कौन और नकली कौन?

मिथुन अहिरवार का सनसनीखेज दावा पहले मतदाता सूची से नाम ग़ायब हुआ, फिर उसी नाम पते पर दो नई पहचानें पैदा हो गईं; SIR पर उठे ऐसे सवाल जो लोकतंत्र को ग़फ़लत की कालकोटरी मे कैद कर सकते हैं!!

               BBC_OF_INDIA

           जनसम्पर्क Life 

Bhopal/Mp: लोकतंत्र की किताब में वोटर लिस्ट को अक्सर वह पवित्र सफ़्हा माना जाता है, जहां एक नागरिक की मौजूदगी सिर्फ़ एक नाम नहीं बल्कि उसके संवैधानिक वजूद की गवाही होती है। मगर मध्यप्रदेश की सियासत में अब उसी सफ़्हे पर स्याही फैलाने के संगीन इलज़ामात लग रहे हैं! 

  

जी हां साहेबांन....

सियासत में इल्ज़ाम नए नहीं होते, लेकिन कुछ सवाल ऐसे होते हैं जो सीधे सत्ता, सिस्टम और लोकतंत्र की पेशानी पर उभरते निशान छोड़ देते हैं। मध्यप्रदेश में चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर उठा ताज़ा विवाद कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है।

प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता मिथुन अहिरवार ने दावा किया है कि जिस प्रक्रिया को चुनाव आयोग ने मतदाता सूची की सफ़ाई और पारदर्शिता का सबसे बड़ा अभियान बताया था, उसी प्रक्रिया के बाद उनके नाम पर दो-दो नई वोटर आईडी जारी हो गईं। दिलचस्प यह है कि नाम वही, पिता का नाम वही, पता वही बस वोटर नंबर मे तबदिली।

बहरहाल इस मामले मे अहिरवार का कहना है कि कुछ समय पहले उनका नाम मतदाता सूची से ही ग़ायब हो गया था। मामला मीडिया में उछला तो आयोग हरकत में आया, मगर कथित तौर पर जो सुधार होना था, उसकी जगह एक नया सवाल खड़ा हो गया। दावा है कि नाम वापस जोड़ने के बजाय उनके नाम से दो अलग-अलग वोटर पहचान पत्र जारी कर दिए गए।

अब सवाल यह है कि अगर घर-घर सत्यापन हुआ, अगर बीएलओ ने दस्तक दी, अगर दस्तावेज़ों की जांच हुई, अगर पूरी कवायद इतनी ही मुकम्मल और बेदाग़ थी, तो फिर एक ही आदमी की दो नई पहचानें किस दरवाज़े से सिस्टम में दाख़िल हो गईं?

कांग्रेस प्रवक्ता ने तंज़िया लहज़े में पूछा है कि चुनाव आयोग यह भी साफ़ करे कि आख़िर असली वोटर आईडी कौन-सी है और नकली कौन-सी। क्योंकि जब पहचान ही दो हिस्सों में बंट जाए तो भरोसा किस पर किया जाए?

अहिरवार ने आयोग के उस पुराने बयान का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि जिन मतदाताओं के नाम सूची से हट गए हैं, वे पुराने पहचान पत्र के आधार पर मतदान कर सकेंगे। ऐसे में उनका सवाल है कि यदि पुरानी पहचान भी ज़िंदा है और नई दो पहचानें भी मौजूद हैं, तो क्या लोकतंत्र के इस गणित में एक मतदाता तीन बार गिना जाएगा या फिर कहीं कोई बड़ी गड़बड़ी छिपी बैठी है?

सवाल सिर्फ़ मिथुन अहिरवार का नहीं है। सवाल उस आम आदमी का भी है जो हर चुनाव में उंगली पर स्याही लगाकर यह यक़ीन करता है कि उसका वोट उसके नाम से जुड़ा है, किसी गलती, गड़बड़ी या सरकारी लापरवाही से नहीं।

प्रदेश कांग्रेस का आरोप है कि करोड़ों रुपये खर्च कर, लाखों लोगों की मेहनत झोंक कर और पारदर्शिता के बड़े-बड़े दावे कर जिस SIR अभियान को अंजाम दिया गया, अगर उसके बाद भी मतदाता सूची में ऐसे विवाद सामने आ रहे हैं तो फिर यह बहस लाज़िमी है कि आखिर इस पूरी मशक्कत का हासिल क्या रहा?

अहिरवार ने भारतीय जनता पार्टी, चुनाव आयोग और उससे जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों से खुलेतौर पर सार्वजनिक जवाब मांगा है। उनका कहना है कि प्रदेश की जनता को यह जानने का हक़ है कि मतदाता सूची में कथित तौर पर पैदा हुई इन विसंगतियों की जवाबदेही कौन लेगा।

फिलहाल आयोग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन यह मामला एक बार फिर उस पुराने सवाल को ज़िंदा कर गया है जिसे लोकतंत्र बार-बार सुनना नहीं चाहता 

अगर मतदाता की पहचान ही शक के घेरे में आ जाए, तो फिर चुनाव की पवित्रता का भरोसा किस काग़ज़ पर लिखा जाएगा?

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